आज रेडिओ दिवस हैं, शौकीन तो मैं भी था 1986 में रेडिओ सिलोन के "हफ्ते के श्रोता" कार्यक्रम में मेरा भी खत पढ़ा गया था जिससे मुझे पुरे देश के 72 दोस्त मिले थे.इसमें नासिक रोड की सुधा नागर का जिक्र उल्लेखनीय हैं. 1988 में दक्षिण भारत में 1 साल की ट्रेनिंग में गया वहां गेहूँ की रोटी मिलती नहीं थी. हर खाद्य में चावल. मैं भावुक मन से में रोटी के लिये घर पर और मित्रों खत को लिखता था, एक बार सुधा (रेडिओ मित्र ) ने मेरे लिये 16 रोटी पार्सल भेजी थी जिस पर 80 रुपये की पोस्टल टिकट लगी. रोटियों के पहुंचने में उस पर चींटीया और उसके सफेद अंडे भी लग गये थे, हॉस्टल में रोटियों को लेकर जश्न मन गया था, लगभग 40 बच्चे टूट पड़े उस रोटी पार्सल पर. जिसमें तमिल भाषी भी थे, जो आज भी याद करते हैं मेरे हाथ भी रोटी का सिर्फ एक छोटा टुकड़ा आया था जो मैने अपनी रिकॉर्ड बुक में दबा कर वर्षो रखा.लगभग 35 सालों तक हमारी दोस्ती रहीं सुधा हर त्यौहार में खत पर शक्कर चिपका कर भेजती थी जबकी हम कभी मिले नहीं ना देखा ! सुधा की दो चोटी वाली फोटो आज भी एल्बम में हैं. उसके खत की भाषाई आत्मीयता और मर्यादा शायद ही किसी रिश्ते में मिले ! आवाज दे कहाँ हैं......
बुधवार, 19 अगस्त 2026
अगर आपको सुना दिखा सब सही लगता हैं तो निश्चय ही आप मुझसे असहमत होगें, क्योकी मेरी अब तक की जिन्दगी के अनुभवो में पांखण्ड ही ज्यादा नजर आया किसी ने रिश्तो की रस्म अदायगी की, तो किसी ने फर्ज या दायित्व कह कर टाल दिया , गरीब हो कर सीखा की मेहनत से आदमी अमीर होता हैं पर अमीर मेहनत कराने वाला हुआ, धूप,बरसात,गर्मी और ठंड में जी तोड मेहनत करता मजदूर गरीब ही रहा, बाजार में बचत करके अमीर होने की बात भी खारिज हो गई क्योकी यहां भी खर्च करने वाला ही अमीर हैं, जनप्रिय की कसौटी पर जनप्रतिनीधि ज्यादा ही जनता से दूर हैं ,सर्वव्यापी भगवान भी बेबस हैं उनके कपाट खुलने बन्द होने नाहने ,वस्त्र धारण, भोग का वक्त भी धर्म के ठेकेदारो द्वारा निर्धारित किया जा रहा हैं सरकारी दफतरो की तरह यहां भी सुविधा शुल्क हैं , डाक्टर मरने तो नही देता तो ठीक भी नही होने देता , वकील हारने नही देता तो जीतने भी नही देता, गुरू का दर्जा कर्मचारीयो जैसा हैं,और इस तरह जब सच न दिखे तो झूठ भी क्यो टिके .......? ब्लागिग में मेरा यही मिशन हैं .....
जन्मदिन 30 अक्टुबर 1968
स्थान भिलाई

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