हमारे दौर में रेडिओ सुनना, पैसे हो तो फिल्मे देखना या पत्र लिखने का शौक था आज रिल्स का दौर हैं , कुछ रील्स वाकई अच्छे, मनोरंजक और सीख देने वाले होते हैं। लेकिन, लगभग 95 प्रतिशत रील्स फूहड़, फालतू और बनाने वाले के व्यक्तित्व के ओछापन को सामने लाने वाले होते हैं। तकनीक के साथ यह घटिया और बेहद फूहड़ उपक्रम है।
आज के अखबार में एक रिपोर्ट है कि बिहार जैसे पिछड़े राज्य में भी 60 प्रतिशत किशोर उम्र के नाबालिग बच्चे प्रतिदिन 4 से 5 घंटे रील्स बनाने पर खर्च करते हैं।यह रिपोर्ट राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने जारी किया है।
मोबाइल और सोशल मीडिया का यह निकृष्टतम कुप्रभाव है अब अभिभावकों के लिए सचेत होने का वक्त भी है। यह मानसिक रूप से रोगी बना देने वाली आदत साबित हो सकती है।

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